19 वीं शताब्दी में जब महिलाओं को कितनी स्वाधीनता मिलनी चाहिये, इस बात पर चर्चा चल रही थी, तब भारत में नारी आनदोलन की प्रथम नेत्री, महाराष्ट्र की अग्निकन्या पन्डिता रमाबाई का भाषन सुनकर रवीन्द्रनाथ जी ने लिखा थाः
" रमाबाई ने कहा, महिलायें हर विषय में पुरुषों के समान हैं, सिर्फ मद्यपान को छोड़कर। आजकल 'पुरुषाश्रय' के विरोध में जो एक 'कोलाहल' उठा है, वह मुझे असंगत एवं अमंगलजनक लगता है। पहले महिलायें पुरुषों के 'अधीनताग्रहण' को ही अपना धर्म मानती थी। . . . एवं यह अधीनता ही उनके चरित्र को महानता प्रदान करती थी।. . . आजकल महिलाओं का एक वर्ग क्रमागत एक सुर में कह रही हैं, हम पुरुषों के आश्रय में हैं, हमारी हालत 'शोचनीय' है। इससे सिर्फ स्त्री-पुरुषों के बीच 'सम्बन्ध-बन्धन-हीनता प्राप्त' हो रही है।. . . इससे स्त्रीवर्ग की उन्नति तो बहुत दूर की बात है, उनलोगों को ही 'सम्पूर्ण क्षति' होगी। "
"स्त्री शिक्षा अत्यावश्यक है, इसे प्रामाणित करने के लिये ये कहना कि उनकी बुद्धि पुरुषों के समान है, की कोई जरुरत नही है। . . . महिलाओं में एक तरह की 'ग्रहणशक्ति', 'धारणाशक्ति' होती है, लेकिन 'सृजनशक्ति' का बल नही होता। . . . महिलाओं चाहे कितनी ही पढाई लिखाई कर ले, इस कार्यक्षेत्र में कभी भी वो पुरुषों की समानता नही कर सकतीं। इसका एक कारण है शारीरिक दुर्वलता। . . . स्त्रियों को संतान गर्भ में धारण एवं संतान पालन करना ही पड़ेगा। यह एसा कार्य है, जिसमे काफी समय उन्हे घर में व्यतीत करना पड़ता है।. . . 'बलसाध्य' काम करना प्रायः असम्भव है।"
नोटः रवीन्द्रनाथ जी के बारे में मै उतना ही जानता हुँ, जितना एक आम आदमी जानता है, और उनके प्रति श्रद्धा भी उतनी ही है। रवीन्द्रनाथ जी के उपर किसी भी तरह की टिप्पनी करने की योग्यता मुझमें नही है। यह पुरा लेख कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली बंगला दैनिक से "आनन्द बाजार पत्रिका" के 07-05-2006 के "रविवासरीय" अंक से उद्धृत है। मेरा उद्देश्य सिर्फ यह बात आपलोगो के साथ "शेयर" करना और इस विषय पर आपकी राय जानना है।
Sunday, May 07, 2006
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2 comments:
हम लोगो में अक्सर एक आदत पाई जाती है जिसे हम महात्मा, संत या महान मान लेते हैं उनके बारे में कोई भी बुरी बात या उनकी गलतियों के बारे में सुन नही पाते या सहन नहीं कर पाते, गोया वे महान पुरुष सीधे स्वर्ग से ही अवतरित हुए हों।
वहीं मुझे लगता है कि जो कोई भी श्रेष्ठ हुआ है, उसकी समालोचना करना आम आदमी अपना जन्मसिद्ध अधिकार ही समझता है। कोई श्रेष्ठ पुरुष देवता नहीं होता मगर हम उसकी श्रेष्ठता में भी बुराई ढूँढते हैं। आनन्दबाज़ार पत्रिका को अपने रविवासरीय में अचानक इन चीज़ों को छापने की क्या ज़रूरत आ पड़ी, क्या पता। खै़र, रवीन्द्रनाथ की समालोचना करने की मुझमें बिल्कुल भी योग्यता नहीं है। उनका टैलेंट अतुलनीय है, शायद भगवान प्रदत्त, इसमें क्या शक है।
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